‘अरे शंकर उठ जा वरना आज भी सोने के चक्कर में ब्रेकफास्ट छोड़ेगा तू और दोपहर को मेरे को गाली देगा’- विशाल, होस्टल में मेरी माँ की भूमिका अदा करता है!
‘अरे क्या यार तुझे नहीं दिखता क्या, कितना मस्त सपना देख रहा था।फालतू में मूड ऑफ कर दिया इस पराठे के चक्कर में ना जाने कितने सपने अधूरे राह गये’-इतना कहने के साथ बेड से बाहर निकला लेकिन दिल और दिमाग अभी भी उस सपने को पूरा करना चाहता था…मग़र ये साला पराठा!
*दो साल पुरानी बात*
दुर्गा पूजा की छुट्टी होने वाली थी अब चुकी कॉलेज का पहला साल था तो इन दो से तीन महीने में कॉलेज के कुछ हीं लोगों से जान पहचान हुई थी।अब तक का जो फ्रेंड लिस्ट था वो पुरुष प्रधान हीं रहा था अब इस लिस्ट में अगर किसी का इंतज़ार था तो वो थी कालेज के दूसरे दिन नज़र आने वाली पतली सी लड़की,बिलकुल मेरी तरह बड़ी-बड़ी आँखे,मुखड़ा तो ऐसे खिला रहता है कि शरमा जाये चाँद भी उसे देखकर।डिपार्टमेंट तो एक ही था हमदोनों का लेकिन रोल नम्बरों के बीच फासला था नतीज़न दो अलग-अलग क्लास में पहुंच गए, जिसका खामियाजा मुझे अफ़सोस जाता कर भुगतना पड़ा! मग़र मेरी इंजिनीरिंग ड्रॉइंग में दिलचस्पी यहां मुझे एक दिलचस्प तोहफ़ा दे गई…उससे एक मुलाकात का मौका!
धन्यवाद रहेगा उस भाई का जो है तो लड़की मग़र पूरा यूनिवर्स उसे ब्रो बुलाता है।शायद इस मेरे यूनिवर्सल भाई ने मेरी दुखती रगों को पकड़ लिया था।मौका मिलतें ही उन नसों को दबाया भी और उस लड़की से मिलाया भी,बात तो सिर्फ इंजीनियरिंग ड्राइंग किट देने की हुई थी जिसके बहाने मैं अपना नंबर दे आया।उसके बाद कभी कभार बात होते रही वो भी सिर्फ़ व्हाट्सएप तक ही सीमित रह गया, कभी सेमेस्टर रिजल्ट तो कभी त्योहार की बधाई, यही होता था मेरा बहाना उससे बात करने का।
अपने अंतर्मुखी स्वभाव के वजह से कभी खुल कर बता न सका, हां लेकिन एहसाह करा दिया था कि वो पसंद है मुझे।
दूसरे सेमेस्टर के शुरू के दिनों में इतना सोचने लगा था उसके बारे में कि हाल बेहाल होने लगा था।जितने रोमांटिक गीत थे सब के सब एक साथ हमारी परिस्थितियों को बयां करने लगे थे, अभी हालात नार्मल नहीं हुए थे कि आ गया कॉलेज फेस्ट,इन कुछ दिनों में जो बेहाली छाई भई क्या बतायें,गाना अरिजीत सिंह गा रहा होता था,रो हम रहे होते थे।शूकर है तब दोस्तों का सहारा था वरना मारिज-ए-इश्क़ होने के दहलीज पर खड़ा था मैं तो। .
*वर्तमान*
दो वर्ष बीत गए,अभी भी हफ्ते-दो-हफ्ते में कभी-कभी बात हो जाया करती है तो कभी महीनों चैट बॉक्स में सन्नाटा फैला होता है।आज फिरसे साड़ी में दिखी,पिछले दो वर्षों से जो लड़की ढंग से बात नहीं कर रही थी वो आज हवा में हाथ हिलाकर ‘हाय’ बोल रही है तो वहीं दूसरे हाथ से गालों पर आ टीकी लटों को कान के पीछे कर रही है,अभी हाय का रिप्लाई करने ही वाला था कि ‘अरे शंकर उठ जा वरना आज भी सोने के चक्कर में ब्रेकफास्ट छोड़ेगा तू और दोपहर को मेरे को गाली देगा’ आवाज़ कान में गूंज गया।
अजीब संयोग था मैंने उसको व्हाट्सएप के जरिये बता भी दिया-’सपने में देखा तुमको’। कुछ देर बाद फ़ेसबुक नोटिफिकेशन आया ‘टू इयर्स एगो’ ठीक दो साल पहले आज ही के दिन कॉलेज फेस्ट था जिसमें वो साड़ी पहन कर कैटवॉक कर रही थी उसी साड़ी में आज सपने में दिखी थी!इत्तेफाक ही है शायद वरना हमको क्या ख़बर…..❤️